जयशंकर प्रसाद की लिखी कहानी चूड़ीवाली, Chudiwali - Story Written By Jaishankar Prasad

Mar 18, 01:30 PM

‘‘अभी तो पहना गई हो।’’

‘‘बहूजी, बड़ी अच्छी चूडिय़ाँ हैं। सीधे बम्बई से पारसल मँगाया है। सरकार का हुक्म है; इसलिए नयी चूडिय़ाँ आते ही चली आती हूँ।’’

‘‘तो जाओ, सरकार को ही पहनाओ, मैं नहीं पहनती।’’

‘‘बहूजी! जरा देख तो लीजिए।’’ कहती मुस्कराती हुई ढीठ चूड़ीवाली अपना बक्स खोलने लगी। वह पचीस वर्ष की एक गोरी छरहरी स्त्री थी। उसकी कलाई सचमुच चूड़ी पहनाने के लिए ढली थी। पान से लाल पतले-पतले ओठ दो-तीन वक्रताओं में अपना रहस्य छिपाये हुए थे। उन्हें देखने का मन करता, देखने पर उन सलोने अधरों से कुछ बोलवाने का जी चाहता है। बोलने पर हँसाने की इच्छा होती और उसी हँसी में शैशव का अल्हड़पन, यौवन की तरावट और प्रौढ़ की-सी गम्भीरता बिजली के समान लड़ जाती।

बहूजी को उसकी हँसी बहुत बुरी लगती; पर जब पंजों में अच्छी चूड़ी चढ़ाकर, संकट में फँसाकर वह हँसते हुए कहती-‘‘एक पान मिले बिना यह चूड़ी नहीं चढ़ती।’’ तब बहूजी को क्रोध के साथ हँसी आ जाती और उसकी तरल हँसी की तरी लेने में तन्मय हो जातीं।

कुछ ही दिनों से यह चूड़ीवाली आने लगी है। कभी-कभी बिना बुलाये ही चली आती और ऐसे ढंग फैलाती कि बिना सरकार के आये निबटारा न होता। यह बहूजी को असह्य हो जाता। आज उसको चूड़ी फँसाते देख बहूजी झल्लाकर बोलीं-‘‘आज-कल दूकान पर ग्राहक कम आते हैं क्या?’’

‘‘बहूजी, आज-कल ख़रीदने की धुन में हूँ, बेचती हूँ कम।’’ इतना कहकर कई दर्जन चूडिय़ाँ बाहर सजा दीं। स्लीपरों के शब्द सुनाई पड़े। बहूजी ने कपड़े सम्हाले, पर वह ढीठ चूड़ीवाली बालिकाओं के समान सिर टेढ़ा करके ‘‘यह जर्मनी की है, यह फराँसीसी है, यह जापानी है’’ कहती जाती थी। सरकार पीछे खड़े मुस्करा रहे थे।

‘‘क्या रोज नयी चूडिय़ाँ पहनाने के लिए इन्हें हुक्म मिला है?’’ बहूजी ने गर्व से पूछा।

सरकार ने कहा-‘‘पहनो, तो बुरा क्या है?’’

‘‘बुरा तो कुछ नहीं, चूड़ी चढ़ाते हुए कलाई दुखती होगी।’’ चूड़ीवाली ने सिर नीचा किये कनखियों से देखते हुए कहा! एक लहर-सी लाली आँखों की ओर से कपोलों को तर करती हुई दौड़ जाती थी। सरकार ने देखा, एक लालसा-भरी युवती व्यंग कर रही है। हृदय में हलचल मच गयी, घबराकर बोले-‘‘ऐसा है, तो न पहनें।’’

‘‘भगवान करें, रोज पहनें।’’ चूड़ीवाली आशीर्वाद देने के गम्भीर स्वर में प्रौढ़ा के समान बोली।

‘‘अच्छा, तुम अभी जाओ।’’ सरकार और चूड़ीवाली दोनों की ओर देखते हुए बहूजी ने झुँझलाकर कहा।

‘‘तो क्या मैं लौट जाऊँ? आप तो कहती थीं न, कि सरकार को ही पहनाओ, तो जरा उनसे पहनने के लिए कह दीजिए’’

‘‘निकल मेरे यहाँ से।’’ कहते हुए बहूजी की आँखे तिलमिला उठी। सरकार धीरे से निकल गये। अपराधी के समान सर नीचा किये चूड़ीवाली अपनी चूडिय़ाँ बटोरकर उठी। हृदय की धड़कन में अपनी रहस्यपूर्ण निश्वास छोड़ती हुई चली गयी।